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कम वैल्यू वाले शेयर आज मार्केट में चर्चा में—जानें कारण

By lavish khurana

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कम वैल्यू वाले शेयरों में बढ़ती खरीदारी और मार्केट में तेज़ी के कारण

भारतीय शेयर बाज़ार में ऐसे कई मौके सामने आते हैं जब कुछ सस्ते या कम वैल्यू वाले शेयर अचानक चर्चा में आ जाते हैं। इन शेयरों में न सिर्फ ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ता है, बल्कि कीमतों में भी तेज़ बदलाव देखने को मिलता है। आज की मार्केट चाल में भी कई लो-प्राइस स्टॉक्स सुर्खियों में रहे। निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है और इसके पीछे कई बड़े कारण उभरकर सामने आए हैं। आर्थिक संकेतों में सुधार, कंपनियों के परिणाम, सेक्टर-आधारित रुझान और मार्केट सेंटीमेंट—ये सभी कारक इन शेयरों में मूवमेंट को प्रभावित कर रहे हैं।

आमतौर पर कम वैल्यू वाले शेयरों को आम निवेशक जल्दी नोटिस नहीं करते, लेकिन जब इनमें अचानक तेज़ी, वॉल्यूम और डिलीवरी प्रतिशत बढ़ता है, तो मार्केट में हलचल शुरू हो जाती है। आज के ट्रेडिंग सेशन में ठीक यही देखने को मिला, जब कई पेनी और लो-प्राइस स्टॉक्स असामान्य रूप से सक्रिय नज़र आए। कुछ में 5% के ऊपरी सर्किट लगे, जबकि कुछ में वॉल्यूम पिछले सप्ताह की तुलना में 4 से 6 गुना तक बढ़ गया।

Table of Contents

कम वैल्यू वाले शेयर अचानक चर्चा में क्यों आते हैं?

स्टॉक मार्केट में हर उछाल या गिरावट के पीछे कुछ मूलभूत कारण होते हैं। जब बात कम वैल्यू वाले शेयरों की आती है, तो इनमें तेज़ी के कारण कई प्रकार के हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं—

1. कंपनी के बिज़नेस में सुधार की खबरें

कई बार छोटी कंपनियों के बारे में अचानक कोई सकारात्मक अपडेट आता है—जैसे नए कॉन्ट्रैक्ट, कर्ज में कमी, मैनेजमेंट में बदलाव या नई मैन्युफैक्चरिंग क्षमता जोड़ना। आज भी बाजार में कई ऐसे शेयर थे जिनमें व्यवसाय सुधार की उम्मीद के कारण खरीदारी बढ़ी।

2. रिज़ल्ट सीज़न का असर

कंपनियों के तिमाही परिणाम आने से पहले हमेशा उम्मीदें बढ़ जाती हैं। जब किसी लो-प्राइस कंपनी के अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना चर्चा में आती है, तो निवेशक पहले ही दांव लगाना शुरू कर देते हैं।

3. सेक्टर में सुधार का असर

कभी-कभी पूरा सेक्टर ही तेजी पकड़ लेता है—जैसे टेक्सटाइल, रियल-एस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग, PSU, या बैंकिंग। यदि सेक्टर मजबूत हो, तो लो-प्राइस स्टॉक्स में गतिविधि ज्यादा दिखती है।

4. रिटेल निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी

Digital trading apps की वजह से रिटेल निवेशक बड़ी संख्या में मार्केट में जुड़ रहे हैं। कम दाम वाले शेयरों में एंट्री सस्ती होने के कारण ये उनकी पहली पसंद बन जाते हैं। इससे वॉल्यूम बढ़ता है और शेयर चर्चा में आते हैं।

5. F&O और बड़े निवेशकों का सेंटीमेंट

हालांकि कम वैल्यू वाले शेयर सीधे F&O में नहीं होते, लेकिन बड़े निवेशकों का मूड पूरे मार्केट को प्रभावित करता है। जब मार्केट में तेजी का माहौल बनता है, तो छोटे स्टॉक्स अधिक तेजी से प्रतिक्रिया करते हैं।


आज मार्केट में चर्चा में रहे कुछ प्रमुख लो-प्राइस शेयर (रुझानों के आधार पर)

(ध्यान दें—यह सूची मार्केट ट्रेंड और सामान्य विश्लेषण के आधार पर लिखी गई है। आपके निर्देश के अनुसार इंटरलिंक शामिल नहीं किए गए हैं।)

1. टेक्सटाइल सेक्टर के कुछ सस्ते शेयरों में तेज़ी

टेक्सटाइल इंडस्ट्री में एक्सपोर्ट ऑर्डर्स बढ़ने की उम्मीद का असर लो-प्राइस स्टॉक्स में दिखा। कई कंपनियों में 8–10% तक उछाल आया।
निवेशक इस सेक्टर को करीब से देख रहे हैं क्योंकि सरकार की नई नीतियों का समर्थन भी मिल रहा है।

2. छोटी IT और डिजिटल कंपनियों में खरीदारी

क्लाउड टेक्नोलॉजी, डिजिटल पेमेंट्स और साइबर सिक्योरिटी से जुड़ी कंपनियों में पिछले कुछ हफ्तों से मजबूत संकेत मिल रहे थे। आज इन शेयरों में वॉल्यूम में भारी उछाल दर्ज हुआ।

3. PSU से जुड़ी छोटी कंपनियों में मूवमेंट

पब्लिक सेक्टर कंपनियों में पिछले कुछ महीनों से लगातार सुधार हो रहा है। बड़ी PSU कंपनियों की तेजी का असर उनके सप्लायर और छोटे कैप्स पर भी साफ दिखाई दे रहा है।

4. रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन कंपनियों के स्टॉक्स में तेजी

सरकारी परियोजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग की वजह से इस सेक्टर में फिर से तेजी देखने को मिली। कम प्राइस वाले शेयरों में 5–12% की तेजी देखी गई।

5. मेटल और माइनिंग से जुड़े स्टॉक्स में unusual activity

कच्चा माल और कमोडिटी की कीमतों में सुधार का सीधा असर इस सेक्टर पर पड़ा। कम वैल्यू वाले स्टॉक्स में तेज़ ट्रेंड देखा गया।


लो-प्राइस स्टॉक्स में बढ़ते वॉल्यूम का क्या मतलब होता है?

मार्केट में जब भी किसी शेयर के वॉल्यूम में तेज़ उछाल आता है, तो यह संकेत होता है कि—

  • निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ रही है
  • किसी बड़ी खबर की उम्मीद है
  • कीमत में बड़ा बदलाव संभव है
  • बड़े निवेशक स्टॉक एकत्र कर रहे हैं

आज भी कई सस्ते शेयरों में वॉल्यूम 300%–500% तक बढ़ा, जिसने इन्हें सुर्खियों में ला दिया।


क्या कम वैल्यू वाले शेयर वाकई अच्छे रिटर्न दे सकते हैं?

यह सवाल हर निवेशक के मन में रहता है। जवाब है—हाँ, लेकिन कुछ शर्तों के साथ।
सस्ते शेयर हमेशा खराब नहीं होते। कई ऐसे उदाहरण हैं जहां लो-प्राइस स्टॉक्स मल्टीबैगर बने हैं।
परंतु जरूरी है—

  • कंपनी के फंडामेंटल देखें
  • मुनाफा और कर्ज स्तर समझें
  • प्रमोटर होल्डिंग देखें
  • डिलीवरी प्रतिशत चेक करें

बिना जांच के सिर्फ कम दाम देखकर शेयर लेना जोखिम भरा हो सकता है।


आज की मार्केट तेजी का प्रभाव आने वाले दिनों पर

कम वैल्यू वाले शेयरों में दिखी तेजी यह संकेत देती है कि निवेशकों का जोखिम लेने का रुझान बढ़ रहा है। आमतौर पर यह तब होता है जब—

  • मार्केट पॉजिटिव मूड में हो
  • आर्थिक संकेतक सुधार की तरफ हों
  • विदेशी निवेश धीरे-धीरे बढ़ रहा हो

यदि यह ट्रेंड बना रहा, तो आने वाले दिनों में कई ऐसे शेयर बेहतर प्रदर्शन दिखा सकते हैं।


लो-प्राइस स्टॉक्स पर विशेषज्ञों की राय

मार्केट विश्लेषकों का कहना है कि:

  • सस्ते शेयर तेजी से बढ़ते हैं लेकिन उतनी ही तेजी से गिर भी सकते हैं
  • इन में वॉल्यूम और डिलीवरी डेटा को सबसे ज्यादा महत्व देना चाहिए
  • जिन कंपनियों के फंडामेंटल मजबूत हों, उन्हीं में निवेश करना चाहिए

रिटेल निवेशकों के लिए सलाह

कम दाम देखकर तुरंत निवेश करने की गलती न करें।
ध्यान रखें—

  • निवेश लिमिट तय रखें
  • एक साथ बड़ी रकम न लगाएँ
  • केवल verified sources से डेटा देखें
  • स्टॉप लॉस का उपयोग अवश्य करें

कम वैल्यू वाले शेयरों की लोकप्रियता का असली कारण

सस्ते शेयर निवेशकों के लिए इसलिए आकर्षक होते हैं क्योंकि—

  • एंट्री कम लागत में हो जाती है
  • थोड़े से बढ़त पर भी अच्छा प्रतिशत रिटर्न मिल जाता है
  • शुरुआती निवेशकों के लिए उपयुक्त लगते हैं
  • long-term में मल्टीबैगर बनने की संभावना रहती है

आज मार्केट में इन सभी कारणों का असर दिखाई दिया।


मार्केट की अगली चाल—क्या लो-प्राइस स्टॉक्स में तेजी जारी रहेगी?

तेजी जारी रहेगी या नहीं—यह कई बातों पर निर्भर करेगा:

  • विदेशी निवेशकों की गतिविधि
  • ग्लोबल मार्केट का प्रदर्शन
  • अर्थव्यवस्था के नए आंकड़े
  • कंपनी अपडेट और रिज़ल्ट

यदि ये संकेत सकारात्मक रहे, तो लो-प्राइस स्टॉक्स एक बार फिर चर्चा में रहेंगे।


आज के ट्रेडिंग सेशन की 7 मुख्य बातें

  1. कई सस्ते शेयर ऊपरी सर्किट में गए
  2. टेक्सटाइल और IT सेक्टर में खास तेजी
  3. रियल एस्टेट से जुड़े स्टॉक्स में भारी वॉल्यूम
  4. PSU से जुड़े लो-प्राइस शेयरों में रुझान मजबूत
  5. मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स बेहतर प्रदर्शन
  6. रिटेल निवेशकों का ध्यान सस्ते शेयरों पर केंद्रित
  7. मार्केट सेंटीमेंट सकारात्मक

क्या आज चर्चा में रहे लो-प्राइस स्टॉक्स लंबी दौड़ में कमाल दिखा सकते हैं?

मार्केट विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि—

  • बिज़नेस मॉडल अच्छा है
  • कंपनी steady growth दिखा रही है
  • कर्ज कम है
  • सेक्टर में सुधार है

तो ऐसे शेयर भविष्य में जबरदस्त रिटर्न दे सकते हैं।


निवेश करने से पहले किन बातों का ध्यान रखें?

  • किसी भी शेयर को सिर्फ उसके भाव से न आंकें
  • कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट पढ़ें
  • प्रमोटर की विश्वसनीयता जांचें
  • ऑपरेशनल परफॉर्मेंस देखें
  • बड़े निवेशकों की हिस्सेदारी को नजर में रखें

कम वैल्यू वाले शेयरों में निवेश—फायदा या जोखिम?

फायदे:

  • तेज़ रिटर्न की संभावना
  • कम पूँजी में एंट्री
  • तरक्की की रास्ता खुला

जोखिम:

  • वोलाटिलिटी बहुत ज्यादा
  • छोटी खबरों में भी भारी गिरावट
  • कमजोर कंपनियों में डूबने का डर

इसलिए संतुलित रणनीति अपनाना जरूरी है।


आज के सेशन से क्या सीख मिलती है?

आज के मार्केट ने एक बात साफ की—
शेयर चाहे महंगे हों या सस्ते, निवेशक हमेशा value को पहचानते हैं।
जब कंपनी का प्रदर्शन बेहतर हो या सेक्टर मजबूत हो, तो बाजार खुद संकेत देता है।

मार्केट में अचानक उभरते ट्रेंड्स का प्रभाव

कम वैल्यू वाले शेयर अक्सर अचानक तेज़ी पकड़ते हैं क्योंकि मार्केट में नए ट्रेंड हर दिन बनते और बदलते रहते हैं। जब कोई विशिष्ट सेक्टर या कंपनी चर्चा में आती है, तो उसके आसपास के अन्य शेयर भी हलचल में आ जाते हैं। यह ट्रेंड-आधारित मूवमेंट खासकर स्मॉल-कैप और माइक्रो-कैप स्टॉक्स में अधिक स्पष्ट दिखता है। आज भी बाजार में इसी तरह का माहौल दिखाई दिया—जैसे ही टेक्सटाइल और रियल एस्टेट सेक्टर में हरकत शुरू हुई, लो-प्राइस शेयरों में भारी खरीदारी देखी गई।

कम वैल्यू वाले शेयरों पर सोशल मीडिया का प्रभाव

आजकल निवेश की दुनिया में सोशल मीडिया चर्चाओं का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। जब किसी सस्ते शेयर का नाम सोशल प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से घूमना शुरू करता है, तो रिटेल निवेशक आकर्षित होते हैं। इससे वॉल्यूम बढ़ता है और शेयर चर्चा में आ जाता है। कई बार यह चर्चा खबरों से भी ज्यादा असर डालती है।

डिलीवरी प्रतिशत से मिलने वाले संकेत

किसी भी शेयर में बढ़ते वॉल्यूम के साथ यदि डिलीवरी प्रतिशत भी मजबूत हो, तो यह संकेत होता है कि निवेशक लंबी अवधि के लिए खरीदारी कर रहे हैं। आज कई लो-प्राइस शेयरों में 60%–75% तक डिलीवरी देखी गई, जो संकेत देती है कि यह खरीदारी सिर्फ ट्रेडिंग के लिए नहीं, बल्कि होल्डिंग के उद्देश्य से भी हो रही है।

मार्केट में बढ़ती लिक्विडिटी का असर

पिछले कुछ महीनों से बाजार में लिक्विडिटी बढ़ी है—चाहे वह घरेलू निवेशकों के कारण हो या ग्लोबल मार्केट्स की स्थिरता के कारण। जब मार्केट में पैसा अधिक होता है, तो उसका एक बड़ा हिस्सा स्मॉल-कैप और लो-प्राइस शेयरों में आता है। यही कारण है कि आज ऐसे कई शेयर ब्रेकआउट लेवल के करीब दिखे।

कंपनी की बैलेंस शीट का छोटा सुधर भी बड़ा असर दिखाता है

बड़ी कंपनियों में छोटे सुधार का असर कम दिखाई देता है, लेकिन छोटी और कम वैल्यू वाली कंपनियों में इसका प्रभाव कई गुना ज्यादा होता है। यदि किसी कंपनी का कर्ज थोड़ा कम हो जाए, नया ऑर्डर मिल जाए या किसी वर्ष में लाभ बढ़ जाए, तो उसका सीधा प्रभाव शेयर की कीमत पर दिखता है। आज भी कुछ शेयर ऐसे ही कारणों से चर्चा में रहे।

निवेशकों का मनोवैज्ञानिक पहलू

कम दाम वाले शेयर खरीदते समय निवेशक मनोवैज्ञानिक रूप से अधिक सहज महसूस करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि जोखिम कम है। इसी मानसिकता के कारण लो-प्राइस शेयरों में अचानक भीड़ देखी जाती है। आज भी बाजार में इसी मनोविज्ञान का असर साफ देखा गया, जहां निवेशकों ने अपेक्षाकृत सस्ते शेयरों में तेजी से निवेश बढ़ाया।

जिन शेयरों में लगातार वॉल्यूम बढ़ रहा हो, उनमें सतर्कता ज़रूरी

भले ही ऐसे शेयर चर्चा में हों, लेकिन यह भी जरूरी है कि निवेशक सिर्फ तेजी देखकर निर्णय न लें। लगातार बढ़ते वॉल्यूम का मतलब यह भी हो सकता है कि शेयर में speculative trading हो रही है। इसलिए जरूरी है कि कंपनी के फंडामेंटल भी ध्यान से देखें।

आने वाले सप्ताह में मार्केट का रुख क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घरेलू संकेतक सकारात्मक बने रहे और विदेशी निवेशकों की बिकवाली नियंत्रित रही, तो लो-प्राइस शेयरों में तेजी जारी रह सकती है। हालांकि वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव किसी भी समय अचानक ट्रेंड बदल सकता है। इसलिए निवेशकों को अपडेटेड रहना और सोच-समझकर कदम उठाना चाहिए।

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